Wednesday, August 17, 2011

रंग बदलती मोहब्बत देखी

वक्त के साथ रंग बदलती मोहब्बत देखी

हम तो दीवाने हुए, उसने सहूलियत देखी



हमने कसमों को निभाने में कसर ना रखी

उसने इक वादा भी करने में मुसीबत देखी



वो तो मसरूफ रहा महफिलों में गैरों की

मैं कोई नाम भी लूं, माथे पे सलवट देखी



कहीं न चैन मिला, न सुकून पलभर का

दिल के बीमारों की, अक्सर यही हालत देखी



ये हुआ क्या कि संगदिल पे यकीं कर बैठे

नूर चेहरे का नज़र आया, न नीयत देखी


हमने पत्थर में बसे इश्क की धड़कन सुन ली

उसने तो ‘ताज’ में भी कब्र-ए-मोहब्बत देखी



गोया हम दिल को बहलाने की तो चीज़ न थे

के याद आएं तभी जब कभी फुर्सत देखी



किसी से हाथ छुड़ाया, कहीं पकड़ा दामन

इश्क के नाम पे दुनिया में सियासत देखी



कुछ सुकूं पाने को खोली थी जुबां ‘अर्चन’ ने

उसके हर लफ्ज़ में दुनिया ने बगावत देखी

सपने छलते हैं...

जीवन की हर धूप छांव में

संग हर कदम चलते हैं

फिर भी सपने छलते हैं....

मन की जाने कितनीं गांठें

सपनों में खुलती जाती हैं

पर जब नजरें मिलतीं सच से

हर उलझन बढ़ती जाती है

दिल में बेहद ‘अपने' जैसे

सांझ सवेरे पलते हैं...

फिर भी सपने छलते हैं....

कभी हंसाते, कभी रुलाते

‘कल’ की आशा नई सजाते

मीत के जैसे साथ-साथ में

डाले हरदम हाथ, हाथ में

संग छूटे तो आंखों के रस्ते

आंसू बनकर ढलते हैं

सपने हरदम छलते हैं....

सपनों का साथ जरूरी भी है

ढोने की मजबूरी भी है

मंजिल की उम्मीद न कोई

चलते रहना दस्तूरी भी है

बढ़ते पांवों को अक्सर

ये नागों जैसे डसते हैं

सपने हरदम छलते हैं....

रिश्ता गहरा है आंखों से

बस जाते इनमें चुपके से

डेरा डाले रहते हर पल

हरदम कसमस करते रहते

चोट लगे, छन से बिखरें जब

किरचों जैसे धंसते हैं...

सपने आखिर छलते हैं....

सांसों संग गुंथ जाते सपने

जीवन भर भरमाते सपने

जितना दूर हटाओ दामन

उतना पास बुलाते सपने

सीने में गर दफन रहें

फूटे छालों से जलते हैं

सपने हरदम छलते हैं....

बुरा लगता है

वादा करके भी ना आओ तो बुरा लगता है
मैं रूठूं तुम ना मनाओ तो बुरा लगता है

हाँ जानती हूँ मैं भी है प्यार तुमको भी
जो किसी रोज़ ना जताओ तो बुरा लगता है

इस हंसी पे है मेरी धडकनों का दारोमदार
तुम गैरों के लिए मुस्कुराओ तो बुरा लगता है

तुम पे हक मेरा है, और फ़क़त मेरा है
तुम जो थोड़ा सा भी कतराओ तो बुरा लगता है

Monday, July 25, 2011

तय कर लिया है..

तय कर लिया है..

मैंने,

अब कभी

तुम्हें याद नहीं करूंगी....

मैं तुम्हें

याद करना ही न चाहती....

बंद रखूंगी

मन के किवाड़

चाहे कुछ भी हो..

नहीं खोलूंगी सांकल...

मैं, थक चुकी हूं...

तुम्हारी यादों को

खुद से दूर करते...

फिर भी,

इस बार

इरादा पक्का है...

इसी जद्दोजहद में

आंख लग जाती है...

न जाने कब...

पर..

पहले ही स्वप्न में,

तुम सामने आ खड़े होते हो....

अचकचा जाती हूं मैं...

खुद को रोक नहीं पाती

और हमेशा की तरह

दौड़ कर...

छिपा लेती हूं

खुद को

तुम्हारे सीने में...

और तुम...

सिसकियों से कांपते मेरे बदन को

हौले से थपकाते हो...

मेरे आंसू थमते ही नहीं..

जाने क्यों,

बढ़ती ही जाती है

बेचैनी...

तभी...

आंख खुल जाती है..

और मैं खुद को

अपराधी महसूस करने लगती हूं

हमेशा की तरह...

सोचती हूं...

मुझे अब तुम्हें

याद नहीं करना चाहिए...

किसी भी हालत में

नहीं....

और ... इस बार...

इरादा पक्का है मेरा.....??

Friday, May 27, 2011

झूठ में डूबा हुआ था वो ,,,,,

झूठ में डूबा हुआ था वो सर से पांव तलक
जाने क्यों फिर भी उसपे इतना ऐतबार आया
वो गुमान में रहा कि मुझको कोई इल्म नहीं
इसी नादानी पर तो उसकी हमें प्यार आया

अब कोई फर्क नहीं पड़ता ...



अब कोई फर्क नहीं पड़ता ...
तुम आओ या
ना आओ...
जीवन की
कड़ी धूप में..
घटा बन, छाओ
या ना छाओ...


ये एकतरफा सही
फिर भी मगर
प्यार तो था
हां, तुम कहते रहे
‘दोस्ती’ इसको, पर..
तुम्हें स्वीकार तो था
ना जाने क्यों रहा
मुझको ये यकीं हरदम
तुम न मेरे सही,
मैं हूं तुम्हारी, कम से कम
अब कोई फर्क नहीं पड़ता
तुम पास बुलाओ
या ना बुलाओ...


मैंने देखा है
बहुतों को
इश्क करते हुए
प्यार के नाम पर
मारते हुए
मरते हुए
मैं नहीं उनमें
जो किसी के वास्ते
जां दे दूं...
जिसने इज़हार तक ना किया
उसे कैसे बेवफा कह दूं??
पर...
अब कोई फर्क नहीं पड़ता
तुम प्यार जताओ
या ना जताओ.


मैं मानती हूं
कि कुछ मजबूरियां
भी होती हैं
प्यार की किस्मत में
कुछ दूरियां भी होती हैं
मैं बेरुखी का सबब
तुमसे पूछती ही रही
पर तुम खामोश रहे
और कहा कुछ भी नहीं...
अब..
कोई फर्क नहीं पड़ता
तुम बताओ
या ना बताओ...

मुझे फर्क नहीं पडता
तुम आओ
या ना आओ...

Friday, May 6, 2011

बीच लहरों के सजा रखा है ये घर हमने

इन आंधियों का कभी पाला नहीं डर हमने

बीच लहरों के सजा रखा है ये घर हमने


वो और लोग थे जिनको काफिले थे नसीब

उम्र सारी ही तनहा किया सफर हमने


अब कोई काम नहीं तेरी इबादत के सिवा

ये और बात है कि पूजा है पत्थर हमने


जाने क्या बात है उनमें कि हम मुरीद हुए

किसी के आगे झुकाया नहीं था सर हमने


रश्क क्यों न करे तुझपे जमाना सारा

के तुझे टूट के चाहा है उम्र भर हमने


ये खता नहीं, है सरासर जुर्म ए नामाफी

भूल से कह दिया सच को, सच अगर हमने


मैं मानती हूं रूठकर, थे तुझे ज़ख्म दिए

शब गुजारी है उसके बाद फिर रोकर हमने


सामने था तो समझी नहीं कीमत उसकी

बाद खोने के उसे ढूंढ़ा है दर-दर हमने


कैसे कह दूं कि हां, कसूर हुआ था ‘अर्चन’

कितने तेवर से उसे मारी थी ठोकर हमने