Friday, December 17, 2010


यूं तो हमने भी मोहब्बत में, धोखे खाए हैं बहुत
दिल तोड़कर किसी का, फिर भी पछताए हैं बहुत

Wednesday, February 24, 2010

बोलो क्यों खामोश हो गए???

पापा नहीं रहे. बीती 28 जनवरी हमारे लिए मनहूस दिन साबित हुई. यकीन नहीं होता. जैसे कोई बहुत बुरा सपना देखा हो. ऐसा सपना जो टूटता ही नहीं।
पापा बीते तीन साल से अल्जाइमर्स से पीड़ित थे. एक असाध्य रोग. शुरू-शुरू में वो बात करते-करते अटक जाते थे. धीरे-धीरे बातों का संदर्भ भूलने लगे. उन्हें अपनी बात कहने के लिए सही शब्द नहीं मिलते. अभिव्यक्ति की असमर्थता उन्हें बुरी तरह झुंझला देती. बाद में उनकी बातें वाक्यों में नहीं, बल्कि चंद शब्दों में ही सीमित होकर रह गईं।
बहुत तकलीफदेह था उन्हें इस हालत में देखना. वो खुद में खोये रहते, किसी चीज में, किसी व्यक्ति में कोई रुचि नहीं. आखिरी बार बीते साल नवंबर में उन्हें मिली तो काफी देर तक देखते रहने के बाद बोले, ‘चेहरा देखा है.... नाम भूल जाता हूं’. जैसे किसी ने पहाड़ से नीचे फेंक दिया हो मुझे. पापा मेरा नाम भूल गए??? कैसे? क्यों??
अभी इस झटके से उबरी भी नहीं थी कि पता चला उन्हें कैंसर है.... पेट में. बहुत देर हो चुकी थी. डॉक्टर ने गिनती के दिन दिए उन्हें. कोई कुछ नहीं कर सकता था.... सिवाय इंतजार के. पापा को इतना निरीह कभी नहीं देखा था. पर हम सब भी तो वैसे ही थे.... लाचार, बेबस. ईश्वर से प्रार्थना के अलावा करते भी क्या. उनके आखिरी समय में उनके पास न होने का दर्द मेरे साथ हमेशा रहेगा.... उनकी यादों की तरह.


बोलो क्यों खामोश हो गए???

याद हैं बचपन के वो दिन प्यारे
खेल-खिलौने, चंदा-तारे
सुनीं थीं तुमसे कथा कहानी
ओरी बिल्ली, राजा रानी
सीखी तुमसे ‘अं’ की बिंदी
गुणा भाग, अंग्रेजी हिंदी
तुमने बतलाया था इक बार
संस्कृति और धर्म का सार
शब्द तुम्हारे कहां खो गए
बोलो.... क्यों खामोश हो गए?

कंठस्थ तुम्हें थे श्लोक हजार
विशुद्ध ज्ञान के थे भंडार
समय ने कैसी करी ठिठोली
न जाने क्यों छीन ली बोली
किसकी नजर लगी हे राम
भूल गए अपनों के नाम
जनक ही सीता को न चीन्हे
ऐसा कभी सुना किसी ने
इतने क्यों निर्मोह हो गए
बोलो..... क्यों खामोश हो गए?

थी कितनी तुमको पीड़ा हाय
मूढ़ मगज हम समझ न पाए
घाव तुम्हारे सब भर जाते
ऐसा मरहम कहां से लाते
सुन पाने को तुम्हरी बानी
करी तपस्या, मन्नत मानी
व्यर्थ हो गए सभी प्रयास
दिखती कोई नहीं थी आस
क्या थे तुम और क्या हो गए
बोलो..... क्यों खामोश हो गए?

उस पर और कुठाराघात
छोड़ गए हम सबका साथ
तुमने काट लिए सब मोह
हमसे सहा न जाए विछोह
आंखें झर-झर बहती जाएं
तुमसा धीरज कहां से लाएं
मां का सूना-सूना माथा
लाल रंग से टूटा नाता
क्यों ऐसी गहरी नींद सो गए
बोलो ..... क्यों खामोश हो गए?

Wednesday, October 14, 2009

फिर सज गईं कंदीलें


देखो....फिर से सज गईं कंदीलें/जुगनू से बिखर गए दूर तलक/

हवाओं की ठंडी महक फिर भर गई है सांसों में/

हौले से दस्तक हुई है...जेहन में/ वो कच्ची-पक्की यादें...

शायद फिर लौट आई हैं/

दबा के रखा था/ बड़े जतन से जिन्हें/अपनी मजबूरियों के तले/

वो ख्वाहिशें... वो उम्मीदें...मुझसे फिर सवाल करती हैं/

कहां है वो...कहां है जिसे शिद्दत से याद करती है..................

Thursday, February 12, 2009

प्रेम दिवस पर.....



इन्द्रधनुष नहीं मेरा प्यार
जो सिर्फ़ बारिश में खिले

मोती भी नहीं मोहब्बत मेरी
जो मिले गहरे पानी तले

चाँद भी नहीं प्यार मेरा
नज़र आए बस्स साँझ ढले

मेरा प्यार तो है हवा सरीखा
हर पल तुम्हें स्पर्श करे.....
और...... तुम्हें पता भी न चले.



Tuesday, January 20, 2009

काश तुम यह जान पाते

काश तुम यह जान पाते

किस तरह मैं जी रही हूँ
कौन सा विष पी रही हूँ
किस तरह कटती हैं रातें
किस कदर चुभती हैं बातें
बोझ सीने पर मेरे है
वेदना में प्राण पाते
काश तुम यह जान पाते


जब भी मिली तुमसे, मिली मैं
ह्रदय में यह आस लेकर
मोड़ दोगे भाग्य रेखा
हाथ में यह हाथ लेकर
देखते आंखों में मेरी
टुकड़े हुआ अरमान पाते
काश तुम यह जान पाते


जब भी सुना था गीत मेरा
ह्रदय का संगीत मेरा
पूछा के किसकी प्रेरणा से
कौन मन का मीत मेरा
झांकते आँखों में मेरी
ख़ुद की ही तस्वीर पाते
काश तुम यह जान पाते

कितना ही लिखा मैंने
कागज़ भी किए काले
तुम समझे न व्यथा मेरी
हांथों में पड़े छाले
और करूँ जतन कितने
कम से कम इतना बताते
काश तुम यह जान पाते

आस भी रोने लगी है
साँस भी खोने लगी है
करती रही इंतजार तेरा
ज़िन्दगी सोने लगी है
किरण बनकर सूर्य की तुम
काश तुम मुझको जगाते
काश तुम यह जान पाते



Monday, October 27, 2008

याद तुम्हारी आती है....

ठंडी महक हवाओं की
जब साँसों मे भर जाती है
बरबस बहतीं हैं आँखें
और मन में हूक उठाती है
तब याद तुम्हारी आती है....


आँगन मे जलती कंदीलों पर
तितली आ मंडराती है
भर लेने को लौ बांहों मे
ख़ुद ही दहन हो जाती है
तब याद तुम्हारी आती है....


रात वो काली-अंधियारी
जब दुनिया दीप जलाती है
दीपो के संग जलूं बावरी
काया भी कुम्हलाती है
तब याद तुम्हारी आती है....

जब याद तुम्हारी आती है....