Thursday, March 13, 2008

बुरा न मानो होली है

के पी एस गिल
ऐसी-तैसी हो गयी, शर्मिंदा है देश
देखो हॉकी पर मचा, कैसा आज कलेश
कैसा आज कलेश, के माली चमन उजाडे
मोटी उनकी खाल, जिन्होंने खेल बिगाडे
उनकी मनमानी के कारण हालत ऐसी
कर डाली है 'चक दे' की भी ऐसी-तैसी

शाहरुख़ खान
किंगखान की हो रही, देखो कैसी मौज
चुटकी में तैयार की, ज़बरदस्त एक फौज
ज़बरदस्त एक फौज, किया लंबा घट-जोड़
अरबों रुपये कमाने को, खर्चे कई करोड़
जब दुनिया भर के लिए क्रिकेट बना भगवान्
आईपीएल की गंगा में हाथ धोयें किंग खान


बाला साहब ठाकरे
बिहारी जन को कहे, कैसे ये अपशब्द
लोकतांत्रिक देश का, उफ़!! ऐसा प्रारब्ध
उफ़!! ऐसा प्रारब्ध, दे रहे गाली कितनी
मत फैलाओ भाई-भाई में नफरत इतनी
बोलो बालासाब, शरण हम जाएं तिहारी
कैसे तुम्हरे मित्र कहाएं अटल बिहारी

Wednesday, January 16, 2008

उलझन

जाने क्या है, जाने क्यों है
सब कुछ है, पर कुछ भी नहीं है

मुट्ठी में मानों बंद ज़िंदगी
हर पल यूं जा रही फिसलती
खोली जो मुट्ठी, कुछ भी नहीं है

नहीं जानती कहाँ है जाना
नहीं जानती क्या है पाना
आंखों में सपना भी नहीं है

क्या-क्या था जो पाना चाहा
क्या पाया, क्या हाथ न आया
कोई शिकवा कोई रंज नहीं है

देखो कहाँ आ खड़ी हुई ज़िंदगी
न कोई गम है न खुशी कोई भी
सुख-दुख का अहसास नहीं है .

कोई ख्वाब नहीं जो हूक उठाये
आंखों में आये, बस जाये
जीवन में कोई अर्थ नहीं है

Tuesday, December 11, 2007

तुम

तुम्हीं से शुरू

तुम्ही पे खत्म

हर एक नज्म मेरी

तुम ख्यालों से जो कभी दूर जाओ
तो कुछ और लिखूं

३ क्षणिकाएँ

ज़िंदगी

ज़िंदगी के केनवास में,
सांसों का ब्रश फेरते ही
उभरता है अक्स तुम्हारा...


याद

कल रात तुम फिर सपने में आये
सुबह आँख खुली तो
तकिया नम था...


खुशी

भूले से जब कभी
मिलती है खुशी, मेरी आंखों में
मुस्कुराते हो तुम ....

Tuesday, October 30, 2007

मधुशाला से प्रेरित....

बच्चन की मधुशाला से प्रेरित....

प्यास है क्या खुद ही न जानूं
मैं चाहूँ कैसा प्याला
सम्मुख तू बैठा हो मेरे
नैनों मे भरकर हाला
घूँट-घूँट तू पिला मुझे
चूर मैं मद से हो जाऊं
चाहे जैसा प्याला हो फिर
चाहे जैसी मधुशाला






यूँ तो है स्वीकार मुझे भी
तेरे अधरों की हाला
यूं तो है स्वीकार मुझे भी
तेरे हाथों से प्याला
किन्तु सब्र कर ले तू साकी
ह्रदय न आकुल कर अपना
शर्म-ओ-हया सब छोड़ के मैं
आऊँगी तेरी मधुशाला






रूठ गया क्यों मेरा साकी
टूटा क्यों मेरा प्याला
अधरों तक आते-आते ही
छलक गई सारी हाला
बूँद-बूँद का मोल मैं तुझ पर
न्योछावर कर दूं साकी
देख तो आकर तुझ बिन कितनी
सूनी मेरी मधुशाला


Saturday, October 27, 2007

तुम न आये ....

तुम न आये

रात भर रोती रहीं तन्हाइयां



तुम आओगे....

बस्स अभी आ जाओगे

साथ मेरे जागती सोती रहीं परछाईयाँ




घूम-घूम कर मेघ आये

बिन बरसे ही चले गए

शूल मेरे तुम चुभोती रहीं पुरवाईयाँ



छोड़कर मुझको गए तुम

राह मे ऐ हमसफ़र

पर न मुझको छोड़ती हैं ये मेरी रूसवाईयाँ

Friday, October 5, 2007

एक नाम अनजाना

एक नाम....
एक आवाज़....
एक अक्स....

जिन्दगी मानो ठहर गई थी
किसी मोड़ पर

हर एक पल को बस्स
वहीँ थाम लेने की जिद थी
हर सांस को वहीँ रोक लेने का जुनून

हवाएं महकने लगी थीं
भीनी-भीनी
फूल खिलने लगे थे हर सू

ख्वाहिशों को लगे पंख
खुशियों ने ऊंची.....ख़ूब ऊंची परवाज़ ली


आंख झपकी भी ना थी
हाँथों से फिसल गयी
मानो एक पूरी सदी

जिन्दगी अब भी ठहरी हुई है
उसी मोड़ पर
सब वैसा ही है
जैसा तब था

एक नाम....(अनजाना सा)
एक आवाज़ (अनचीन्ही सी )
एक अक्स....(धुन्धलाया सा)