पापा नहीं रहे. बीती 28 जनवरी हमारे लिए मनहूस दिन साबित हुई. यकीन नहीं होता. जैसे कोई बहुत बुरा सपना देखा हो. ऐसा सपना जो टूटता ही नहीं।
पापा बीते तीन साल से अल्जाइमर्स से पीड़ित थे. एक असाध्य रोग. शुरू-शुरू में वो बात करते-करते अटक जाते थे. धीरे-धीरे बातों का संदर्भ भूलने लगे. उन्हें अपनी बात कहने के लिए सही शब्द नहीं मिलते. अभिव्यक्ति की असमर्थता उन्हें बुरी तरह झुंझला देती. बाद में उनकी बातें वाक्यों में नहीं, बल्कि चंद शब्दों में ही सीमित होकर रह गईं।
बहुत तकलीफदेह था उन्हें इस हालत में देखना. वो खुद में खोये रहते, किसी चीज में, किसी व्यक्ति में कोई रुचि नहीं. आखिरी बार बीते साल नवंबर में उन्हें मिली तो काफी देर तक देखते रहने के बाद बोले, ‘चेहरा देखा है.... नाम भूल जाता हूं’. जैसे किसी ने पहाड़ से नीचे फेंक दिया हो मुझे. पापा मेरा नाम भूल गए??? कैसे? क्यों??
अभी इस झटके से उबरी भी नहीं थी कि पता चला उन्हें कैंसर है.... पेट में. बहुत देर हो चुकी थी. डॉक्टर ने गिनती के दिन दिए उन्हें. कोई कुछ नहीं कर सकता था.... सिवाय इंतजार के. पापा को इतना निरीह कभी नहीं देखा था. पर हम सब भी तो वैसे ही थे.... लाचार, बेबस. ईश्वर से प्रार्थना के अलावा करते भी क्या. उनके आखिरी समय में उनके पास न होने का दर्द मेरे साथ हमेशा रहेगा.... उनकी यादों की तरह.
बोलो क्यों खामोश हो गए???
याद हैं बचपन के वो दिन प्यारे
खेल-खिलौने, चंदा-तारे
सुनीं थीं तुमसे कथा कहानी
ओरी बिल्ली, राजा रानी
सीखी तुमसे ‘अं’ की बिंदी
गुणा भाग, अंग्रेजी हिंदी
तुमने बतलाया था इक बार
संस्कृति और धर्म का सार
शब्द तुम्हारे कहां खो गए
बोलो.... क्यों खामोश हो गए?
कंठस्थ तुम्हें थे श्लोक हजार
विशुद्ध ज्ञान के थे भंडार
समय ने कैसी करी ठिठोली
न जाने क्यों छीन ली बोली
किसकी नजर लगी हे राम
भूल गए अपनों के नाम
जनक ही सीता को न चीन्हे
ऐसा कभी सुना किसी ने
इतने क्यों निर्मोह हो गए
बोलो..... क्यों खामोश हो गए?
थी कितनी तुमको पीड़ा हाय
मूढ़ मगज हम समझ न पाए
घाव तुम्हारे सब भर जाते
ऐसा मरहम कहां से लाते
सुन पाने को तुम्हरी बानी
करी तपस्या, मन्नत मानी
व्यर्थ हो गए सभी प्रयास
दिखती कोई नहीं थी आस
क्या थे तुम और क्या हो गए
बोलो..... क्यों खामोश हो गए?
उस पर और कुठाराघात
छोड़ गए हम सबका साथ
तुमने काट लिए सब मोह
हमसे सहा न जाए विछोह
आंखें झर-झर बहती जाएं
तुमसा धीरज कहां से लाएं
मां का सूना-सूना माथा
लाल रंग से टूटा नाता
क्यों ऐसी गहरी नींद सो गए
बोलो ..... क्यों खामोश हो गए?
basss yu.n hi kabhi jab khud se kuchh kahne ki hulas uthati hai mann me, baat kagaz pe bikhar jaati hai....
Wednesday, February 24, 2010
Wednesday, October 14, 2009
फिर सज गईं कंदीलें

देखो....फिर से सज गईं कंदीलें/जुगनू से बिखर गए दूर तलक/
हवाओं की ठंडी महक फिर भर गई है सांसों में/
हौले से दस्तक हुई है...जेहन में/ वो कच्ची-पक्की यादें...
शायद फिर लौट आई हैं/
दबा के रखा था/ बड़े जतन से जिन्हें/अपनी मजबूरियों के तले/
वो ख्वाहिशें... वो उम्मीदें...मुझसे फिर सवाल करती हैं/
कहां है वो...कहां है जिसे शिद्दत से याद करती है..................
Thursday, February 12, 2009
प्रेम दिवस पर.....
Tuesday, January 20, 2009
काश तुम यह जान पाते
काश तुम यह जान पाते
किस तरह मैं जी रही हूँ
कौन सा विष पी रही हूँ
किस तरह कटती हैं रातें
किस कदर चुभती हैं बातें
बोझ सीने पर मेरे है
वेदना में प्राण पाते
काश तुम यह जान पाते
जब भी मिली तुमसे, मिली मैं
ह्रदय में यह आस लेकर
मोड़ दोगे भाग्य रेखा
हाथ में यह हाथ लेकर
देखते आंखों में मेरी
टुकड़े हुआ अरमान पाते
काश तुम यह जान पाते
जब भी सुना था गीत मेरा
ह्रदय का संगीत मेरा
पूछा के किसकी प्रेरणा से
कौन मन का मीत मेरा
झांकते आँखों में मेरी
ख़ुद की ही तस्वीर पाते
काश तुम यह जान पाते
कितना ही लिखा मैंने
कागज़ भी किए काले
तुम समझे न व्यथा मेरी
हांथों में पड़े छाले
और करूँ जतन कितने
कम से कम इतना बताते
काश तुम यह जान पाते
आस भी रोने लगी है
साँस भी खोने लगी है
करती रही इंतजार तेरा
ज़िन्दगी सोने लगी है
किरण बनकर सूर्य की तुम
काश तुम मुझको जगाते
काश तुम यह जान पाते
किस तरह मैं जी रही हूँ
कौन सा विष पी रही हूँ
किस तरह कटती हैं रातें
किस कदर चुभती हैं बातें
बोझ सीने पर मेरे है
वेदना में प्राण पाते
काश तुम यह जान पाते
जब भी मिली तुमसे, मिली मैं
ह्रदय में यह आस लेकर
मोड़ दोगे भाग्य रेखा
हाथ में यह हाथ लेकर
देखते आंखों में मेरी
टुकड़े हुआ अरमान पाते
काश तुम यह जान पाते
जब भी सुना था गीत मेरा
ह्रदय का संगीत मेरा
पूछा के किसकी प्रेरणा से
कौन मन का मीत मेरा
झांकते आँखों में मेरी
ख़ुद की ही तस्वीर पाते
काश तुम यह जान पाते
कितना ही लिखा मैंने
कागज़ भी किए काले
तुम समझे न व्यथा मेरी
हांथों में पड़े छाले
और करूँ जतन कितने
कम से कम इतना बताते
काश तुम यह जान पाते
आस भी रोने लगी है
साँस भी खोने लगी है
करती रही इंतजार तेरा
ज़िन्दगी सोने लगी है
किरण बनकर सूर्य की तुम
काश तुम मुझको जगाते
काश तुम यह जान पाते
Monday, October 27, 2008
याद तुम्हारी आती है....
ठंडी महक हवाओं की
जब साँसों मे भर जाती है
बरबस बहतीं हैं आँखें
और मन में हूक उठाती है
तब याद तुम्हारी आती है....
आँगन मे जलती कंदीलों पर
तितली आ मंडराती है
भर लेने को लौ बांहों मे
ख़ुद ही दहन हो जाती है
तब याद तुम्हारी आती है....
रात वो काली-अंधियारी
जब दुनिया दीप जलाती है
दीपो के संग जलूं बावरी
काया भी कुम्हलाती है
तब याद तुम्हारी आती है....
जब साँसों मे भर जाती है
बरबस बहतीं हैं आँखें
और मन में हूक उठाती है
तब याद तुम्हारी आती है....
आँगन मे जलती कंदीलों पर
तितली आ मंडराती है
भर लेने को लौ बांहों मे
ख़ुद ही दहन हो जाती है
तब याद तुम्हारी आती है....
रात वो काली-अंधियारी
जब दुनिया दीप जलाती है
दीपो के संग जलूं बावरी
काया भी कुम्हलाती है
तब याद तुम्हारी आती है....
Saturday, June 7, 2008
और तो कोई चाह नही है
यह कविता उस उम्र मे लिखी थी जिसमे हर व्यक्ति कवि होता है......हालंकि अब मुझे ख़ुद भी काफ़ी बचकानी सी लगती है......
थक जाऊं जब चलते-चलते
मैं जीवन की राहों में
तेज़ धूप से साया देना
मुझको अपनी बाहों में
और नही कुछ कहूँगी तुमसे
और न कोई सुख देना
बस मेरे रिसते ज़ख्मो पर
थोडा सा मरहम रख देना
आंखों मे गर आंसू देखो
सहला देना छालों को
स्नेह्पूरित हाथों से तुम
सुलझा देना बालों को
फिर हम और तुम साथ चलेंगे
एक नयी मंजिल की ओर
जहाँ नयी नित सांझ ढलेगी
जहाँ नयी नित होगी भोर
......
किंतु प्रिये क्या हो सकता है
सत्य ये मेरा सपना
तुझ बिन मुझको दुनिया में
कोई भी न लगता अपना
छोड़ गए जो साथ तुम्ही
जीवन नैय्या बह जायेगी
मेरी यह मासूम कल्पना
साकार नही हो पाएगी
दुःख और दर्द का सागर जीवन
जिसकी कोई थाह नही है
हर दुख सुख मे साथ रहो तुम
और तो कोई चाह नही है
थक जाऊं जब चलते-चलते
मैं जीवन की राहों में
तेज़ धूप से साया देना
मुझको अपनी बाहों में
और नही कुछ कहूँगी तुमसे
और न कोई सुख देना
बस मेरे रिसते ज़ख्मो पर
थोडा सा मरहम रख देना
आंखों मे गर आंसू देखो
सहला देना छालों को
स्नेह्पूरित हाथों से तुम
सुलझा देना बालों को
फिर हम और तुम साथ चलेंगे
एक नयी मंजिल की ओर
जहाँ नयी नित सांझ ढलेगी
जहाँ नयी नित होगी भोर
......
किंतु प्रिये क्या हो सकता है
सत्य ये मेरा सपना
तुझ बिन मुझको दुनिया में
कोई भी न लगता अपना
छोड़ गए जो साथ तुम्ही
जीवन नैय्या बह जायेगी
मेरी यह मासूम कल्पना
साकार नही हो पाएगी
दुःख और दर्द का सागर जीवन
जिसकी कोई थाह नही है
हर दुख सुख मे साथ रहो तुम
और तो कोई चाह नही है
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