Friday, February 14, 2014

वो जो कॉफ़ी उधार है तुम पर ..

वो जो कॉफ़ी उधार है तुम पर ..

महज़ एक मग नहीं है
भाप उगलता हुआ 
वक़्त है वो
जो संग तुम्हारे बिताना है मुझे 
हौले हौले चुस्कियां लेते हुए 

उस वक़्त को
लंबा.... और भी लंबा खींचना है मुझे 

हंसना मत मुझपर
गर ठंडी हो चुकी उस कॉफ़ी को भी मैं
ठंडा... और भी ठंडा होने दूँ

और फिर पियूँ भी, तो यूँ
मानो अब भी हो बहुत गर्म

बस समझ जाना
अभी और वक़्त बिताना चाहती हूँ
तुम्हारे साथ

वो जो कॉफ़ी उधार है तुम पर...
महज बहाना नहीं है
तुमसे मुलाकात का
एक अहसास है नया
बेहद खुशनुमा सा
उन पलों .. को जी भर के जीना है मुझे

वो जो कॉफी उधार है तुमपे
बस इतना समझ लो.…
चंद साँसें उधार हैं तुमपे...!!!

कहीं रख के खुद को भूल गयी हूँ

कहीं रख के 
खुद को भूल गयी हूँ 
ढूंढ़ के ला दो...
सुध-बुध खो बैठी हूँ अपनी
याद दिला दो ...

चाँद नहीं सोने देता अब
पलभर मुझको रातों में
भर आती हैं ओस की बूँदें
चांदनी बनके आंखों में
कब से पलकें नींद से बोझिल
लोरी गा दो....
कहीं रख के खुद को
भूल गयी हूँ
ढूंढ के ला दो...

शीशे जैसा
चम-चम चमके
उजियारा सा आठों पहर
ऐसी आदत थी न कभी भी
कैसे बूझूं शाम-ओ-सहर
जाए सहा न इतना उजाला
सांझ बुझा दो...
कहीं रख के खुद को
भूल गयी हूँ
ढूंढ के ला दो...

मिलना तो मुमकिन ही नहीं
होगा अपनी तक़दीरों का
बीच हमारे फिर भी कोई
रिश्ता तो है लकीरों का
हाथों में ये हाथ रहे
इतनी दुआ दो...
कहीं रख के खुद को
भूल गयी हूँ
ढूंढ के ला दो...

Thursday, February 13, 2014

सांस चलने तक

कश्मकश सारी की सारी .. सांस चलने तक 
हर घड़ी इक बेकरारी ..... सांस चलने तक 

हाथ खाली लेके आए... जाना भी है वैसे ही 
ये हमारी..वो तुम्हारी ....... सांस चलने तक 

ना सुनी दिल की कभी ..... खौफ 'लोगों' का रहा
उफ्फ़! ये ‘फ़िक्र-ए-दुनियादारी’ .. सांस चलने तक

मौत को ना मात...  दे पाएगा कोई पैंतरा
बेवजह की होशियारी..... सांस चलने तक 

नसीहतें... हिदायतें.. तल्कीन.. कुछ फरमाइशें
ये रवायतें औ’ रियाकारी.... सांस चलने तक 

‘आज’ की जद्द-ओ-जहद....‘कल’ के इंतजाम में
है मुसलसल जंग जारी ..... सांस चलने तक

‘अहसान’ सी जिंदगी....‘अर्चन’ उतरती भी नहीं
धड़कनों पर बोझ भारी...... सांस चलने तक 

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तल्कीन      =  उपदेश
रवायतें       =  परंपराएं
रियाकारी     =   आडंबर
मुसलसल     =  लगातार

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Thursday, May 24, 2012

...नहीं आता

‘दस्तूर-ए-जहां’ हमें अब तलक नहीं आता
दोस्त क्या.. दुश्मन पे भी शक नहीं आता


चले चार कदम साथ तो ..... अहसान समझ
इस जमाने में .. कोई भी दूर तक नहीं आता


सैकड़ों बार कसम खाके .... वफा का वादा
पर उनकी रंगीनमिजाजी में फरक नहीं आता


सामने पाके तुझे... दीवानी हुई जाती हूं
फिर याद कोई.. पिछला सबक नहीं आता


है मुद्दतों से इंतज़ार ..जवाब का जिसके
जाने क्यों..... उसका ही ख़त नहीं आता


‘कुर्बानी-ओ-ईसार’ से वाबस्ता है ‘अर्चन’
मोहब्बत में ये लफ्ज़... ‘हक’ नहीं आता

Sunday, May 20, 2012

ढूंढ़ लेता है...



ताज्जुब ये कि गुड़ में भी खटाई ढूंढ़ लेता है

वो मेरे हर हुनर में.. कुछ बुराई ढूंढ़ लेता है


मेरे दर्द, मर्ज़, नब्ज़ को … पहचानता तो है

बड़ा जालिम है पर.. कड़वी दवाई  ढूंढ़ लेता है  


वो 'वो' रहा, मैं 'मैं' रही.. हम 'हम' न हो सके

'मोहब्बत’में भी वो 'अपनी-पराई' ढूंढ़ लेता है    


नहीं ऐसा कि उसमें ऐब ही ना हो कोई

‘सिफत’ पर ये .. ‘सफाई’ से ‘सफाई’ ढूंढ़ लेता है


‘कमज़र्फ’ समझूं या कि .. मैं दीवानगी उसकी

वो हर रिश्ते में मेरे .. 'आशनाई'  ढूंढ़ लेता है


'फर्द-ए-जुर्म' लिखने को खिलाफ 'अर्चन' के

ज़माने भर की सारी रोशनाई ढूंढ़ लेता है

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1. सिफत : खूबी, Exclusivity, Speciality, Uniqueness

2. कमज़र्फ : संकीर्ण मानसिकता वाला, narrow-

minded, bigoted, prejudiced

3. आशनाई : दोस्ती, गहरे ताल्लुकात friendship, close relationship

4. 'फर्द-ए-जुर्म' : आरोपपत्र, Chargesheet

5. रोशनाई : स्याही, Ink

Wednesday, August 17, 2011

रंग बदलती मोहब्बत देखी



वक्त के साथ रंग बदलती मोहब्बत देखी

हम तो दीवाने हुए, उसने सहूलियत देखी


हमने कसमों को निभाने में कसर ना रखी

उसने इक वादा भी करने में मुसीबत देखी


वो तो मसरूफ रहा महफिलों में गैरों की

मैं कोई नाम भी लूं, माथे पे सलवट देखी


कहीं न चैन मिला, न सुकून पलभर का

दिल के बीमारों की, अक्सर यही हालत देखी


ये हुआ क्या कि संगदिल पे यकीं कर बैठे

नूर चेहरे का नज़र आया, न नीयत देखी


हमने पत्थर में बसे इश्क की धड़कन सुन ली

उसने तो ‘ताज’ में भी कब्र-ए-मोहब्बत देखी


गोया हम दिल को बहलाने की तो चीज़ न थे

के याद आएं तभी जब कभी फुर्सत देखी


किसी से हाथ छुड़ाया, कहीं पकड़ा दामन

इश्क के नाम पे दुनिया में सियासत देखी


कुछ सुकूं पाने को खोली थी जुबां ‘अर्चन’ ने

उसके हर लफ्ज़ में दुनिया ने बगावत देखी

सपने छलते हैं...


जीवन की हर धूप छांव में
संग हर कदम चलते हैं
फिर भी सपने छलते हैं....
मन की जाने कितनीं गांठें
सपनों में खुलती जाती हैं
पर जब नजरें मिलतीं सच से
हर उलझन बढ़ती जाती है
दिल में बेहद ‘अपने' जैसे
सांझ सवेरे पलते हैं...
फिर भी सपने छलते हैं....

कभी हंसाते, कभी रुलाते
‘कल’ की आशा नई सजाते
मीत के जैसे साथ-साथ में
डाले हरदम हाथ, हाथ में
संग छूटे तो आंखों के रस्ते
आंसू बनकर ढलते हैं
सपने हरदम छलते हैं....

सपनों का साथ जरूरी भी है
ढोने की मजबूरी भी है
मंजिल की उम्मीद न कोई
चलते रहना दस्तूरी भी है
बढ़ते पांवों को अक्सर
ये नागों जैसे डसते हैं
सपने हरदम छलते हैं....

रिश्ता गहरा है आंखों से
बस जाते इनमें चुपके से
डेरा डाले रहते हर पल
हरदम कसमस करते रहते
चोट लगे, छन से बिखरें जब
किरचों जैसे धंसते हैं...
सपने आखिर छलते हैं....

सांसों संग गुंथ जाते सपने
जीवन भर भरमाते सपने
जितना दूर हटाओ दामन
उतना पास बुलाते सपने
सीने में गर दफन रहें
फूटे छालों से जलते हैं
सपने हरदम छलते हैं....